साधारण सुपरनोवा विस्फोट और न्यूट्रॉन तारों की आपसी टक्कर ही मिल्की वे (Milky Way) तथा उसके पास स्थित एक बौनी आकाशगंगा के चार सबसे रहस्यमयी तारों की रासायनिक संरचना को पूरी तरह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं। लंदन स्थित University College London (UCL) के खगोल भौतिकीविदों ने यह प्रमाणित किया है कि ब्रह्मांड के सबसे भीषण विस्फोट माने जाने वाले ‘हाइपरनोवा’ (hypernovae) शायद अस्तित्व में ही नहीं थे। विज्ञान पत्रिका Monthly Notices of the Royal Astronomical Society (MNRAS) में प्रकाशित दो अलग-अलग शोध पत्रों में वैज्ञानिकों ने दिखाया कि जब कोई सामान्य तारा फटता है, तो उसका मलबा अंतरिक्ष में चारों तरफ बराबर नहीं फैलता, और इसी असमान फैलाव से असामान्य रासायनिक तत्वों वाले नए तारों का जन्म होता है।
इस वैज्ञानिक जांच का नेतृत्व UCL की मुलार्ड स्पेस साइंस लेबोरेटरी (Mullard Space Science Laboratory) के पीएचडी शोधकर्ता अनमोल अग्रवाल (Anmol Aggarwal) ने किया है, जिसमें उसी प्रयोगशाला के डॉ. राल्फ शोनरिच (Ralph Schoenrich) सह-लेखक के रूप में शामिल हैं। ब्रिटिश विश्वविद्यालय ने 5 अक्टूबर 2026 को इन निष्कर्षों की आधिकारिक घोषणा की थी, जिसके बाद बुधवार (14) को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय में इस पर व्यापक चर्चा शुरू हुई। इन दोनों अध्ययनों के प्रारंभिक संस्करण वैज्ञानिक संग्रह arXiv पर पहले ही जमा किए जा चुके थे, जिनमें पहला शोध पत्र 27 मार्च 2026 को और दूसरा 14 अगस्त 2026 को प्रस्तुत किया गया था। बाद में इन्हें MNRAS के खंड 548 (अंक 2) और खंड 551 (अंक 2) में आधिकारिक तौर पर प्रकाशित किया गया।
इन नए गणितीय विश्लेषणों के सामने आने से पहले, मिल्की वे के बाहरी घेरे यानी हेलो (halo) में पाए गए असामान्य रासायनिक अनुपात वाले प्राचीन तारों को हाइपरनोवा के अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता था। खगोलीय मॉडलों में हाइपरनोवा को ऐसे महाविस्फोट के रूप में परिभाषित किया गया था, जो कम से कम 10^52 अर्ग (erg, ऊर्जा मापने की भौतिक इकाई) ऊर्जा छोड़ते हैं। यह मात्रा किसी सामान्य कोर-कोलैप्स सुपरनोवा (ccSN) से निकलने वाली 10^51 अर्ग की औसत ऊर्जा की तुलना में कम से कम 10 गुना अधिक होती है। ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने जब अपनी गणना में इस तथ्य को शामिल किया कि विस्फोट के बाद तारे का पदार्थ गोलाकार और एकसमान रूप से अंतरिक्ष में नहीं बिखरता, तो हाइपरनोवा की परिकल्पना की आवश्यकता ही समाप्त हो गई।
सामान्य सुपरनोवा से तत्वों का असमान बिखराव और तीन प्राचीन तारों की उत्पत्ति
दुर्लभ तारों के जन्म की गुत्थी सुलझाने के लिए अनमोल अग्रवाल और राल्फ शोनरिच ने ‘एनरिचमेंट स्टोकेस्टिसिटी’ (enrichment stochasticity) पर आधारित नए गणितीय मॉडल तैयार किए, जो किसी तारे की मृत्यु के बाद रासायनिक तत्वों के अनियमित बिखराव का आकलन करते हैं। जब कोई साधारण सुपरनोवा फटता है, तो उसमें से निकलने वाली गैसें और भारी धातुएं हर दिशा में एक समान अनुपात में नहीं जातीं। विस्फोट की इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन का बड़ा हिस्सा एक खास दिशा में जा सकता है, जबकि सल्फर (गंधक) किसी दूसरी दिशा में तेजी से फैल सकता है।
अनमोल अग्रवाल ने इस प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा, “यदि हम वर्तमान में किसी सुपरनोवा को देखें, तो तारे के पदार्थ समान रूप से नहीं फैलते हैं। ऑक्सीजन मुख्य रूप से एक दिशा में उड़ सकता है, और सल्फर दूसरी दिशा में। नए तारे सुपरनोवा के तत्वों के कुल मिश्रण के बजाय उसके कुछ हिस्सों के मिश्रण से बन सकते हैं।” मुख्य लेखक ने पुराने सिद्धांत पर इस गणना के सीधे असर को रेखांकित करते हुए आगे बताया, “हमने ऐसे गणितीय मॉडल विकसित किए जिन्होंने इस बात को ध्यान में रखा और हमने हर मामले में पाया कि बहुत ही असामान्य तत्वों के मिश्रण वाले तारे पूरी संभावना के साथ साधारण सुपरनोवा से ही बने थे। हाइपरनोवा के लिए जो भी सबूत हम देखते हैं, वे अचानक गायब हो गए हैं।”
शोध दल ने उन चार अत्यंत कम धातुता (low metallicity) वाले तारों का दोबारा परीक्षण किया, जिन्हें खगोल विज्ञान के साहित्य में अब तक हाइपरनोवा विस्फोटों के प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। पहले अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, इनमें से तीन तारों की रासायनिक संरचना को केवल साधारण कोर-कोलैप्स सुपरनोवा द्वारा अंतरिक्ष में असमान रूप से फेंके गए पदार्थ के माध्यम से पूरी तरह समझाया जा सका। वैज्ञानिकों ने पाया कि पुराने मॉडलों की सबसे बड़ी कमी यह धारणा थी कि सुपरनोवा से निकला मलबा नए तारों का निर्माण करने से पहले अंतरिक्ष की गैस में पूरी तरह और बराबर घुल-मिल जाता है।
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चांदी और यूरेनियम से भरपूर लाल विशालकाय तारे में न्यूट्रॉन तारों के विलय की भूमिका
University College London के वैज्ञानिकों द्वारा जांचे गए चौथे खगोलीय पिंड के लिए गणना के एक अतिरिक्त चरण की आवश्यकता पड़ी, क्योंकि इसके गुण बाकी तीन तारों से काफी अलग थे। SMSS 2003-1142 के रूप में पहचाना गया यह पिंड मिल्की वे के बाहरी हेलो क्षेत्र में स्थित एक विशालकाय लाल तारा (red giant) है, जिसमें ‘आर-प्रोसेस’ (r-process, यानी न्यूट्रॉन के तीव्र अवशोषण की प्रक्रिया) से बनने वाले चांदी और यूरेनियम जैसे भारी तत्वों की भारी अधिकता है। ये तत्व इतने भारी होते हैं कि अधिकांश तारों के केंद्र (core) में इनका निर्माण नहीं हो सकता। चूंकि इस तारे में साधारण न्यूट्रॉन तारों की टक्कर से पैदा होने वाले कुछ अन्य अपेक्षित तत्व नहीं मिले थे, इसलिए खगोलविद अब तक यह मानते थे कि इसका जन्म तेजी से घूमने वाले किसी विशाल तारे के ढहने यानी ‘मैग्नेटोरोटेशनल हाइपरनोवा’ (magnetorotational hypernova) से हुआ था।
जब शोधकर्ताओं ने इस विशालकाय लाल तारे की रासायनिक संरचना की तुलना मिल्की वे के विकास के मॉडल से की, तो पता चला कि सबसे सटीक सांख्यिकीय व्याख्या के लिए 10 गुना अधिक शक्तिशाली विस्फोट की कोई जरूरत नहीं है। इसके बजाय, एक असमान रूप से फटने वाले सामान्य सुपरनोवा और दो घने मृत तारों के आपसी टकराव यानी न्यूट्रॉन स्टार मर्जर (NSM) के संयोजन ने इस पहेली को सुलझा दिया। टीम के गणितीय परीक्षणों में, सामान्य सुपरनोवा और न्यूट्रॉन तारों के विलय को जोड़ने वाले स्टोकेस्टिक मिक्सिंग मॉडल ने 0.24 की रूट मीन स्क्वेयर त्रुटि (r.m.s., एक सांख्यिकीय माप जो वास्तविक आंकड़ों की तुलना में मॉडल की सटीकता को दर्शाता है, जहां कम संख्या बेहतर मेल का संकेत देती है) दर्ज की। यह परिणाम मैग्नेटोरोटेशनल हाइपरनोवा के पुराने मॉडल से कहीं अधिक सटीक साबित हुआ, जिसकी त्रुटि दर 0.44 थी।
- अनुसंधान संस्थान: मुलार्ड स्पेस साइंस लेबोरेटरी, University College London (UCL)
- प्रमुख शोधकर्ता: अनमोल अग्रवाल (मुख्य लेखक) और डॉ. राल्फ शोनरिच (सह-लेखक)
- प्रकाशित शोध पत्र: “An unexplored enrichment stochasticity and its implications for stellar abundance patterns” (MNRAS खंड 548, अंक 2) और “Mixing stochasticity relinquishes evidence for magnetorotational hypernovae” (MNRAS खंड 551, अंक 2)
- ऊर्जा की तुलना: सामान्य कोर-कोलैप्स सुपरनोवा में 10^51 अर्ग बनाम कल्पित हाइपरनोवा में कम से कम 10^52 अर्ग
- सांख्यिकीय सटीकता (r.m.s. त्रुटि): सामान्य सुपरनोवा व न्यूट्रॉन तारा विलय मॉडल में 0.24 बनाम हाइपरनोवा मॉडल में 0.44
रासायनिक उत्पत्ति का पता लगाने के साथ-साथ लेखकों ने अंतरिक्ष में इस विशालकाय लाल तारे की भौतिक यात्रा का भी नक्शा तैयार किया। तारे के घूमने की तेज गति और आकाशगंगा के बाहरी छोर पर इसकी वर्तमान स्थिति का अध्ययन करने के बाद अग्रवाल और शोनरिच इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इस तारे का जन्म हमारी आकाशगंगा के बाहर हुआ था। यह तारा धातुओं की कमी वाली एक पड़ोसी बौनी आकाशगंगा (dwarf galaxy) में बना था, जहां से निकलकर यह बाद में मिल्की वे के गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा खींच लिया गया।
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प्याज जैसी परतों वाले तारों की संरचना और अंतरतारकीय गैस के मिश्रण का अधूरापन
प्राचीन तारों का यह विश्लेषण तारकीय जीवन चक्र पर आधारित है, जो ब्रह्मांड की पहली पीढ़ी के तारों के समय से ही अंतरिक्ष को आकार दे रहा है। खगोल विज्ञान की मानक परिभाषा के अनुसार, हाइड्रोजन और हीलियम से भारी सभी रासायनिक तत्वों को ‘धातु’ (metals) कहा जाता है। जिन तारों में इन धातुओं की मात्रा अत्यंत कम होती है, उनका गहन अध्ययन इसलिए किया जाता है क्योंकि वे ब्रह्मांड के सबसे शुरुआती तारों के रासायनिक निशानों को अपने भीतर सुरक्षित रखते हैं। जब किसी विशाल तारे के भीतर परमाणु संलयन (nuclear fusion) के लिए आवश्यक ईंधन समाप्त हो जाता है, तो उसका केंद्र अपने ही गुरुत्वाकर्षण के दबाव में ढह जाता है। इससे उत्पन्न होने वाली तीव्र शॉक वेव्स बाहरी परतों को अंतरिक्ष में उड़ा देती हैं, जिससे निकले तत्वों से आगे चलकर नए तारों और ग्रहों का निर्माण होता है।
डॉ. राल्फ शोनरिच के अनुसार, ढहने से ठीक पहले किसी तारे की आंतरिक बनावट एक के भीतर एक गोल परतों जैसी होती है, जो सीधे तौर पर यह तय करती है कि अगली पीढ़ी के तारों को किस हिस्से से कितना पदार्थ मिलेगा। UCL के शोधकर्ता ने कहा, “किसी तारे के सुपरनोवा बनने से ठीक पहले, उसमें प्याज की तरह परतें होती हैं, जिसके केंद्र में भारी तत्व होते हैं और हल्के तत्व बाहर की ओर होते हैं। हमारा मॉडल यह देखता है कि देखे गए तारे की संरचना से मेल खाने के लिए प्रत्येक परत या प्रत्येक क्षेत्र से कितने पदार्थ की आवश्यकता होगी।”
Monthly Notices of the Royal Astronomical Society में छपे ये परिणाम अंतरिक्ष में पदार्थों के घुलने-मिलने की वर्तमान वैज्ञानिक समझ की सीमाओं को उजागर करते हैं और सैद्धांतिक खगोल भौतिकी के लिए अगला लक्ष्य निर्धारित करते हैं। शोनरिच ने बताया, “हम अभी भी यह नहीं जानते हैं कि नए तारों का निर्माण करने से पहले सुपरनोवा का पदार्थ कितनी अच्छी तरह आपस में मिलता है। इस क्षेत्र में दशकों के काम के बावजूद यह स्थिति है। हमारा शोध बताता है कि कुछ मिश्रण तो होता है, लेकिन यह अधूरा मिश्रण होता है। हमें अपनी आकाशगंगाओं में रासायनिक तत्वों के विकास और अंतरतारकीय माध्यम (interstellar medium) के काम करने के तरीकों से जुड़े मॉडलों में इस तथ्य को शामिल करने की आवश्यकता है।”
