Paulo Maia ने शहरों में कबूतरों से बीमारियों के प्रसार पर सच बताया
पर्यावरणविद और SOS Aves e Cia के प्रमुख Paulo Maia के अनुसार शहरों में पाए जाने वाले Columba livia प्रजाति के कबूतर किसी भी घातक बीमारी के मूल संवाहक नहीं हैं, क्योंकि वे केवल इंसानी लापरवाही और कचरे के ढेर में मौजूद दूषित तत्वों के संपर्क में आने के बाद ही अनजाने में संक्रमण के वाहक बनते हैं। ब्राजील के जीवविज्ञानी Lucas Jaques de Oliveira ने स्पष्ट किया कि शहरी बस्तियों में इंसानों द्वारा फेंके गए खाद्य अपशिष्ट ही इन परिंदों को आबादी के करीब लाते हैं। दोनों विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा कि इस समस्या के लिए पक्षियों को दोषी ठहराने के बजाय नागरिकों को अपनी स्वच्छता की आदतों में सुधार करना होगा।
शहरी परिवेश में पक्षियों की छवि और जैविक वास्तविकता
अक्सर कबूतरों को उड़ने वाले चूहों की संज्ञा दी जाती है, लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञ इसे वैज्ञानिक रूप से अनुचित मानते हैं। Maia ने बताया कि चमगादड़ या सामान्य कृंतक जीवों की तरह कबूतर भी संक्रमण फैला सकते हैं, परंतु ऐसा कोई रोग अस्तित्व में नहीं है जो केवल इन्हीं से उत्पन्न होता हो।
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यह बेहद चिंताजनक है।
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संक्रमण का माध्यम और सूखे मल से उत्पन्न पैथोजन का प्रसार
जीवविज्ञानी Lucas Jaques de Oliveira के मुताबिक सार्वजनिक कूड़ेदानों में भोजन तलाशने के दौरान कबूतर विभिन्न सूक्ष्मजीवों को छूते हैं और फिर अपने मल के जरिए उन्हें पर्यावरण में छोड़ देते हैं। जब पक्षियों की बीट सूखती है, तब हवा के बहाव के साथ सूक्ष्म कण वायुमंडल में घुल जाते हैं और सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंचकर मानव शरीर को बीमार करते हैं।
- कबूतरों के उत्सर्जित मल में मौजूद Cryptococcus कवक सीधे तौर पर फेफड़ों और मस्तिष्क को प्रभावित करने वाली गंभीर बीमारियों को जन्म देता है।
- सूखे मल के धूल कणों से हिस्टोप्लास्मोसिस, टॉक्सोप्लास्मोसिस, त्वचा संबंधी विकृतियां, सांस की एलर्जी और जानलेवा मेनिनजाइटिस का खतरा उत्पन्न होता है।
Oliveira ने रेखांकित किया कि मेनिनजाइटिस इनमें सबसे भयावह स्थिति पैदा करती है, जो समय पर उपचार न मिलने की दशा में पीड़ित मरीज की जान ले सकती है। उन्होंने कहा कि Cryptococcus कवक के अतिरिक्त अन्य संक्रामक जीवाणु भी इन बीटों में पनपते हैं। नियमित सफाई की कमी के कारण सार्वजनिक स्थानों पर यह विषैला पदार्थ लंबे समय तक जमा रहता है।
अपशिष्ट भोजन पर निर्भरता और आबादी नियंत्रण की चुनौतियां
प्राकृतिक तौर पर Columba livia प्रजाति के ये पक्षी मुख्य रूप से विभिन्न प्रकार के अनाज और बीजों का उपभोग करते हैं। प्राकृतिक भोजन की भारी कमी होने पर वे मजबूरी में शहरों के कचरे से बचा हुआ सड़ा-गला खाना खाने लगते हैं।
सार्वजनिक चौराहों और पार्कों में नागरिकों द्वारा कबूतरों को नियमित दाना डालने से वे उसी स्थान को अपना स्थायी ठिकाना बना लेते हैं। इस भोजन आपूर्ति के कारण पक्षी बार-बार वहीं लौटते हैं और अपने मल से आसपास के पत्थरों तथा बेंचों को दूषित करते हैं। नगर निगम प्रशासन अधिकांश खुले स्थानों पर रोज कीटाणुशोधन नहीं करता है। इस लापरवाही से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर निरंतर संकट बना रहता है।